Monday, August 14, 2006

शीकवाए सुरत: _कल्लु कव्वाल(अग्नात)

शीकवाए सुरत:

हालत सुरत की बनाई अरे बाप रे बाप.
बापु मोदी की दुहाई अरे बापरे बाप.
न पानी बरसा सुरत मेँ ईतना मुशला धार.
बारीश के चंद छीतोँ से आती नही सैलाब.
फीर ये आफ्त आई कहाँ से सोचो मेरे भाई,
सुरत की सोने की मुरत करदी कीसने खराब
भाजप बीलकुल न शरमाई अरे बाप रे बाप.
हालत सुरत की बनाई अरे बाप रे बाप.
उकाई डाम पर बढ्ता था दो हफ्तेप्ते पानी,
ईजनेरोँ की एक भी बात सरकारर्ने न मानी.
छोड् देते पानी वहाँसे धीरे धीरे यारो,
सुरत की ईस हद तक होती न बरबादी.
ये तो साजिश थी बनाई अरे बाप रे बाप
हालत सुरत की बनाई अरे बाप रे बाप.
मेरे सुरत मे बने अमीर भी भिकारी
गरीबकी तो झोंपड्याँ पहले बनी शीकारी,
राँदेर कातो हुलया बदल गया है यारो,
एक मकाँ मे बन गई कब्रोँ की कई कयारी
कोन करे सुनवाई अरे बापरे बाप
हालत सुरत की बनाई अरे बाप रे बाप.
पालन तूटा ,तूटा अडाजण,अरे अंग सुँदर तूटा
कया करेँ हम सुरतीओँका हाय मुकद्दर तूटा
रोने को तो आंसुनहीँ,और पीनेको न पानी,
हाय हमारा बना बनाया सोनेका पीजर तूटा.
कोई दया न आई अरे बाप रे बाप.
हालत सुरत की बनाई अरे बाप रे बाप.
भरती के दिन आये और छोड दिया ये पानी,
ताके तापी मात के आंसु बन जाये न पानी,
अब ये बंजर खेत से कैसी फसल कटेगी यारो
, डर है की बन न जाये ये नकसल मीझोरामी
कैसी है ये जुदाई अरे बाप रे बाप.
गाझिब है खुदाई अरे बाप रे बाप.
समझो मेरे भाई अरे बाप रे बाप.
दुश्मन तमाशाई अरे बाप रे बाप.
बच्चे रुए माई अरे बाप रे बाप
हालत सुरत की बनाई अरे बाप रे बाप.
वीर नगरके बासी है हम ये विपद सह लेंगे
नर्मद की सुनहरी नगरीकी लाज हम रख लेंगे
फीरसे बनायेंगे नये घोंसले मिलकर हमसब ‘कालु’
फेर देखत हैँ आता कैसे गान्धीनगरका भालु.
सुरतको बनाएंगे हाथ मेँ हाथ् मिलाके
तूटा नहीँ है होंसला है अभी विस्वास.
हालत सुरत की बनाई अरे बाप रे बाप.
पापी है घर जाई अरे बाप रे बाप.

_कल्लु कव्वाल(अग्नात)


(कीसी ‘कालु कव्वाल”सुरतीने ए दर्दनाक कव्वाली भेजीहै,दिल हीला देती है)



कैसा रंगीन हुआ है दामने सुरत सुरतीओँ के खूनसे.
सुरज की लाली आके आज ‘वफा शरमाके रहगयी.
‘वफा”

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